Friday, August 16, 2019

सीके संसदमा आउनुपर्छ






घ्यु कहाँ पोखियो? भागै मा। भने जस्तो।

समाजवादी पार्टी ले यो खाली हुन लागेको सीट लाई खाली हुन दिनुपर्छ र यस सीट मा जनमत पार्टी ले सीके राउत को उम्मेदवारी दिने र राजपा र सपा ले उम्मेदवारी नदिएर सीके लाई समर्थन गर्नुपर्छ। यो एक डेढ़ वर्ष पछि सपा र राजपा को एकीकरण पछि जपा सँग एकीकरण गर्न का लागि सपा र राजपा ले डाउन पेमेंट गर्ने हो।

सीके संसदमा आउनुपर्छ। लोकतन्त्रमा संसदको आफ्नै विशिष्ट स्थान हुन्छ। सीके संसदमा पुगे संसदको रौनक बढ्छ।

सप्तरीबाट संसद पुगे सीके ले अर्को चुनावमा जनकपुर को सीट ताकदैनन भन्ने ढुक्क हुन्छ राजेन्द्र महतो लाई।

Monday, August 12, 2019

नागरिकता समस्या का समाधान ब्लॉकचैन पर है

नेपाल में मधेसी समुदाय का प्रमुख समस्या नागरिकता का है। तीन चार बार मधेसियों ने आन्दोलन ही नहीं क्रान्ति ही की। अंतरिम संविधान के बाद देश में नया संविधान जारी हुवा। नए कानुन बनें। लेकिन मधेसी समुदाय का नागरिकता समस्या समाधान होने के बजाय और विकराल होता जा रहा है।

किसी भी मनुष्य को नागरिकता पत्र से वंचित करना मानव अधिकार का हनन है। यानि कि प्रत्येक मनुष्य को किसी न किसी देश का नागरिक होना मानव अधिकार है। जैसे कि वाक स्वतंत्रता मानव अधिकार है। नेपाल के संविधान ने मानव अधिकार को अकाट्य माना है। फिर भी खुलेआम ढेर सारे मधेसियों को नागरिकता पत्र से वंचित किया जा रहा है और वो भी बड़े सुनियोजित ढंग से।

राजनीतिक संघर्ष तो जारी रखना होगा और रहेगा भी। लेकिन मुझे दिख रहा है कि नेपाल के मधेसी के लिए ही नहीं दुनिया के सभी लोगो के लिए नागरिकता और परिचय के समस्या का समाधान नयी उभरती टेक्नोलॉजी ब्लॉकचैन होने जा रहा है।

ब्लॉकचैन (Blockchain) क्या है? बहुत लोग ब्लॉकचैन को बिटक्वाइन (Bitcoin) समझ लेते हैं। वो तो ऐसा हुवा कि आप इंटरनेट को जीमेल (Gmail) समझ लें। इंटरनेट एक बृहत् टेक्नोलॉजी है। उसका एक पक्ष है ईमेल। ईमेल भी ढेर सारे हैं। उस में एक है जीमेल। बिटक्वाइन (Bitcoin) एक क्रिप्टो करेंसी (cryptocurrency) और वैसे और भी हैं जैसे कि ईथरियम (Ethereum) हालांकि सबसे बड़ी बिटक्वाइन (Bitcoin) ही है। लेकिन जिस तरह इंटरनेट एक जीमेल से बहुत बड़ा है उसी तरह ब्लॉकचैन (Blockchain) बिटक्वाइन (Bitcoin) से बहुत बड़ा है।

इंटरनेट व्यक्ति को जानकारी (information) उपलब्ध कराती है। कहा जाता है आज दुनिया के एक मनुष्य जिसके हाथ में स्मार्टफोन है और जिससे वो इंटरनेट सर्फ करता है उसके पास उतनी जानकारी है जितना इंटरनेट से पहले सिर्फ अमेरिका के राष्ट्रपति के पास हुवा करता था।

तो ब्लॉकचैन (Blockchain) को मानिए इंटरनेट से १,००० गुना बड़ा। उससे भी बड़ा। पुराने दुनिया के मीडिया को इंटरनेट ने जो किया पैसा को ब्लॉकचैन (Blockchain) वही करेगी। और सिर्फ पैसा ही नहीं विश्वास (trust) को। ब्लॉकचैन (Blockchain) को मानिए बहीखाता। एक परमानेंट डिजिटल बहीखाता। अगर दुनिया का प्रत्येक ट्रांज़ैक्शन (transaction) एक परमानेंट डिजिटल बहीखाता पर रखा जाए तो क्या होगा? वही ब्लॉकचैन (Blockchain) है।

अगर दुनिया के किसी भी कोने से किसी भी दुसरे कोने तक पैसा आप तुरन्त और जीरो फी पर ट्रांसफर कर सकेंगे तो क्या होगा? क्रांति हो जाएगी। ब्लॉकचैन (Blockchain) वही करने जा रही है।

जिस तरह इंटरनेट न किसी देश का है और न किसी कम्पनी का उसी तरह ब्लॉकचैन (Blockchain) भी न किसी देश का रहेगा और न किसी कम्पनी का। समस्त मानवजाति का रहेगा। जिस तरह इंटरनेट अभी भी निर्माणाधीन ही है उसी तरह ब्लॉकचैन (Blockchain) बनना शुरू हो गया है और सालों दशकों तक बनता ही रहेगा।

वाक स्वतन्त्रता तो इंटरनेट से पहले भी था। लेकिन वाक स्वतन्त्रता इंटरनेट के बाद कुछ दुसरा ही मायने रखती है। उसी तरह मधेसी समुदाय के नागरिकता समस्या को महोत्तरी या धनुषा के जिल्ला कार्यालय अथवा काठमाण्डु के गृह मंत्रालय अथवा बालुवाटार के प्रधान मंत्री निवास से मुक्त किया जा सकेगा। ब्लॉकचैन (Blockchain) पर ही प्रत्येक मधेसी का ही नहीं प्रत्येक मनुष्य का राजनीतिक परिचय सुरक्षित रहेगा। उसी ब्लॉकचैन (Blockchain) पर बैंकिंग कर सकेंगे लोग। हाथ में स्मार्टफोन पर बैंक रहेगा। दिन में एक डॉलर पर दो डॉलर पर गुजारा कर रहे लोगों को बैंक लोन मिलने लगेगा ब्लॉकचैन (Blockchain) पर।

पृथ्वी के उपर हजारों सैटेलाइट घुमेंगे और धरती के कोने कोने पर इंटरनेट उपलब्ध रहेगा। किसी को भी नागरिकता पत्र से वंचित करना असंभव हो जाएगा। बैंक लोन लेने के लिए जमीन जायदाद की जरुरत नहीं पड़ेगी।







Friday, August 02, 2019

SEBS In Turmoil

कुनै पनि भुतपुर्व विद्यार्थी संगठन को सदस्यता स्वतः हुन्छ। तर संगठन को कमिटी आदिमा सक्रिय हुने कुरामा म शुरू देखि नै छैन। सेब्स सानो पोखरी। सागर त नेपालको लोकतान्त्रिक क्रान्ति र मधेसी क्रान्ति थिए। मैले तिनमा समय मनग्गे दिएँ। तर हालसाल सेब्स भित्र गर्मागर्मी छ। त्यस बारे मैले हालै पोस्ट गरेको थिएँ। सेब्स नेपाल को फेसबुक पेज मा र सेब्स अमेरिका को फेसबुक पेज मा। त्यसको पुर्ण पाठ

Paramendra Kumar Bhagat shared a link.
July 25 at 10:49 AM

Hello SEBS. What's going on?

Let me first say, I speak with very little information. All I know is what I have read in a few snippets here and there in the two Facebook groups, SEBS and SEBS-NA. I have no direct information, I have not done a voice chat with anyone. I am not pesonally, directly involved with any matter I bring up.

It is obvious both SEBS and BNKS are in an unprecedented crisis. एक्कासि के भइ दियो यस्तो? क्या हो रहा है? There is talk BNKS might lose a chunk of its land. And that SEBS in Nepal might lose its legal status. The two might even be related. And there is the subplot of the selection of the new principal. Again, I am not privy to details.

BNKS has been a pilot project so far. It should next get more ambitious and talk to the foundations of the world to create an endowment so as to make admissions truly need blind each year. And it should open up its classrooms to the entire nation through use of digital technology. The national school was founded to serve the nation. Such ambitious expansion plans will negate any overtures to take over land.

As to SEBS and SEBS NA, we are all adults here. Let there be open debate and discussion. Voice chat is free these days. You can use Messenger, Viber, Whatsapp, and 10 other apps to talk. There can be no issue that a few conference calls should not be able to resolve.

There are open allegations of foul play in the principal selection process and the earthquake related fundraising and disbursement of funds. I have seen a few newspaper articles. But the golden rule there is, don't believe everything you read. Still, the concerned parties ought to put out clarifying statements.

There is talk of the land mafia in Nepal. A NCP officer now owns a plot of land that used to be part of the PM's residence in Baluwatar. So brazen! This is like Dhirendra sending a crane to Bhaktapur a few years before the Panchayat collapsed.

If this whole thing is a well thought out attack, it reminds me of when CK Raut (https://demrepubnepal.blogspot.com/2019/07/ckraut.html) got arrested the first time. That fast forwarded his political arrival. SEBS is being pulled into the national limelight. There is no escaping the fight. The era of armchair intellectualism might be over. BNKS has to fight to keep its land. SEBS has to fight to keep itself standing.

I hope the issues are resolved and the officeholders wage a coordinated messaging campaign and fight the necessary court battles to come out strong, clean and standing.

(cross posted at Sebs NA)

हालै केही मधेसी मुल का भुतपुर्व विद्यार्थी हरुले मलाई सम्पर्क गरेका छन। मधेसी भएकै कारणले तिनलाई दुर्व्यवहार गरिएको भए त्यो मैले सुन्नु पर्ने हुन्छ। Institutional prejudice can not be tolerated. भन्दैमा मारामार गर भन्ने होइन। पहिलो र सबैभन्दा महत्वपुर्ण अस्त्र त हो आध्यात्मिक। माफ़ गर। तर अन्याय लुकाउ भन्ने पनि होइन। आफ्नो कुरा स्पष्ट सँग राख। न्याय खोज। संघर्ष गर।



My BNKS/SEBS Story

I am 266B, a member of the 11th batch of Budhanilkantha School, called the national school of Nepal. That was the 2046 B.S SLC batch. I was the top student in class from arrival to my Class 10 year, nonstop. In Class 6 I even got the highest marks in every single subject. The number two guy from that time period went to Harvard, to Goldman Sachs, to the World Bank. I held leadership positions along the way. I was House Captain of Makalu in Class 5. I was House Captain of Kanchenjunga in Class 10. Three years before me that had been Badal Pradhan of Jhapa, who recently contested to be School Principal. He had been excellent as House Captain. He would have made an excellent Principal. I won a best actor award in middle school. Also in middle school, I won the schoolwide mental arithmetic championship. During my Class 10 year I won some kind of award for the Division A pentathlon. I was no star athlete, but I participated and won a few things. My Class 10 year as House Captain was exemplary that surpassed anything any House Captain had done to that date in school history.

Towards the end of my Class 10 year I was knee-capped by the people who ran the place, right down from the British Principal all the way to the entire Bahun establishment. Which was enormously confounding to someone of my age. The very people who I looked up to. The very people who held so much power in how things were run. Right after I had served so actively for a year as House Captain. My favorite story from that year was when I tutored someone in the house from a 40% grade scenario to almost 70%. I prevented him from getting kicked out for academic reasons.

But we also literally won every single sports and academic tournament. One British teacher wrote, "I have never seen morale raised to this level in any boarding house at any school, ever."

I learned my true identity in 2016. My story needed to be precisely the way it has unfolded. My achievements, my institutional knee-capping, and the dramatic downward trajectory to my achievements (I ended my A-Levels with three Es, although still the highest SAT score in class). I spent a year after graduation writing a book on Nepali politics based on which the University of Chicago did accept me, "based not on your numbers, but your words." But Manav Bhattarai, 300B, made a deliberate decision to waste that scholarship. I guess he was as much a member of the Bahun establishment as anyone.

I have needed to make my achievements early on precisely to exhibit that ethnic prejudice is harmful, casteism is harmful. Do not argue it does not exist. Do not argue it is not harmful. God himself showed up on earth in human form and experienced it to put those arguments to rest.

Those at the giving end of ethnic prejudice and casteism should confess. Those at the receiving end should forgive.

I went through another set of experiences to do the same for racism. Don't say it does not exist. Don't say it is not harmful.

God explicitly asks in the Geeta that you treat people from all castes equally. Sita Maiya had to go for a second vanavas so as to show what it means to listen even to a Dhobi, even when he is wrong. That was a hard thing for Lord Rama to do. He did it.


August 23, 2019

Some issues have been raised privately and in a few forums.

(1) No, I was not beat up at the bus park. But something gross happened. This is a reference to the end of 1989, towards the end of my Class 10 year. The first incident was towards the end of a soccer match between Kanchenjunga-Nilgiri on a Saturday. There was a minor scuffle. Nilgiri lost and was not happy about it. But then some of them came to the house a little later. I personally saw them collectively pushing Andrew Wild, former housemaster of Kanchenjunga, and him pushing back. This guy Samtenla was in the lead. Things quietened down over the weeks. Or so I thought. When I went to the bus park for the Dashain vacation trip home to Janakpur, I quickly went to New Road to get some gundpak, as I used to doing. I came back, sat on my seat in the cabin. A small group of three or four young people from the outside asked that I step outside. I did not know them. I refused. Then they became rude. One of them pulled my sweater. A few minutes later the bus left since it was time to move. That is all that happened to me. When I came back to school after the vacation was over a few weeks later I learned they had chased my Sports Captain (Gyaneshwar) at that same bus park. They had also humiliated Suneel (who was a few years junior). The public humiliation was a big enough shock to his young mind that he went on to lose his mind. My Vice Captain (Diwaskar) tricked the Nilgiri perpetrators to write and sign an apology letter, addressed to the school authorities. The letter proved they were involved. The letter went to the school authorities. Nothing was done. No action was taken. To my utter surprise, a few weeks later, the British Principal and the entire Bahun establishment got together and decided to kick M-E out of school. That decision was vetoed by Andrew Wild. Then they decided they will kick me out after the SLC exams. That also was vetoed. Finally, they decided to suspend me from my position as House Captain. I was never told why. I still don't know why. I was never told what I did wrong. To me it felt like the apple fell from the tree and flew towards the sky. This was gross injustice. Then they suspended also Gyaneshwar, and then Diwaskar.

(2) Jiwan Wagle, housemaster of Nilgiri, did tell his students, "Whatever you have to do, do it outside the school gates!"

(3) Another "myth" that needs to be busted is that I did not want to be School Captain. I was offered the position. I desperately wanted it. And I was very excited about it. I so wanted to do the work I said I wanted 12 instead of 8 prefects on my team. While I was negotiating on that, they took my spot away. Sudarshan Rijal (it is always a Bahun, if you notice) played a key role. But Brian Garton is central. He can't escape responsibility. The mental slavery of the Bahuns was as evident as their ethnic prejudice and casteism.

(3) During my A1 year I learned of an incident after the fact. Apparently everyone in my batch had been involved. But I had been kept in the dark. They published and distributed a pamphlet. I had nothing to do with it. I only learned about it after the fact.

(4) Before the A Level exams, the school, based on the final exams gave you forecast grades. If you got BCC, it was assumed you will likely get ABB during the actual exams. Often that is what ended up happening. My forecast grades were BCC. That is what was sent to colleges I applied to. That is how it worked for everybody. My actual grades a few months later were EEE. Not ABB. How come! The morning of the first A-Level exam, Andrew Wild shouted at me so loud, people one floor up who were still asleep woke up. It was not because I was going to be late for breakfast. I think it is possible Andrew Wild blamed me for the whole pamphlet incident.

(5) Late in 1993 I had to face the fact that I was not accepted by any college. But I had been working on a book on Nepali politics all along. I applied again with the 300B batch. I got accepted to the University of Chicago, along with four others, "based not on your numbers, but your actions and words." Five seats, but only two scholarships. Rabin Koirala from my batch went to India to do his MBBS. Basant took the seat and went to attend U of Chicago. Manav Bhattarai, on the other hand, deliberately wasted the scholarship. He took the trouble to fly to Chicago. Then he quit after a few months and went to India to do his MBBS. My book had managed to neutralize the EEE at A-Levels. I did have the highest SAT score in my class.

(6) Robert Shrubshall, formerly Head of the English Department at BNKS, who by now was working in Bangladesh, (now he is in Thailand) came over to Kathmandu and arranged a breakfast meeting between me, him and Andrew Wild in Thamel. Wild concluded that meeting by saying to Robert, "Don't you miss it when we used to rule over India!" (Trivia: that book that I sent to Chicago was typed on Andrew's typewriter.)

(7) Hemant Bohra (900b, Himtel) saw me on school grounds and asked me to come with him. He took me to Andrew Wild's place. Wild became unhappy. He tried to insinuate, "Look, I got you into Harvard!"

(8) After Andrew moved to some other job in some other country, perhaps Africa, I came to Berea College in Kentucky. I had a very happy freshman year.

(9) Last year I was at Krishna Chhetri's house in the Bay Area. 400B, a housemate in Gaurishankar. Immediate past president of SEBS North America. My batchmate Kiran Kattel, the first SEBSer to enter Apple ("Founding Father!") and someone who came to see me off at the Kathmandu airport when I first flew to the US for college in Fall 1996, mentioned "Manoj." Manoj was a classmate in Kanchenjunga. He had a health issue. As long as he took his medicine he was fine. If he missed out on the medicine, he would start acting up. Decades later the hint to me was, Manoj perhaps misbehaved with Brian Garton. And that explains Brian Garton's ire! Are you f______g kidding me? In what court of justice am I supposed to be responsible for what Manoj does or did!?

Racism. Ethnic prejudice. Casteism.

(10) Recently a Madhesi SEBSer about 10 years junior to me, who I don't personally know, wrote to me privately online to tell me that there had been a "socially boycott Paramendra Bhagat" campaign run by some SEBSers in DC. I told him I am completely unaware of it. That might have been a reaction to my full-time work towards the Madhesi movement in 2006, 2007. Years before that I was shown some emails from Kiran Sitoula (who I know very well ..... I know all members of his family ... his father was once stationed in Jaleshwar, and I visited his home ... I have visited his home in DC ... around 2001 .... he has played an important role in the founding and functioning of SEBS NA, although there is this disease, prevalent in many Nepali organizations, where the founders never really hand over to any new elected leadership ... you can see that with the NRNs ..... ) ..... So, I was showed this email where he is espousing some remarks about me that could be considered expressions of ethnic prejudice. I did not like it. I made a comment in response which can be called physicalism. Equally wrong. But to make the point that ethnic prejudice is not fine. ... But we met in person at the ANA Convention in New Jersey in 2004 ... We had a normal conversation. I have not met him since. We are in different cities. I have not met Manoj Acharya and Kamal Rana Bhat either. There is no bad blood.



Note: The Bahuns are a chosen people just like the Jews. God would choose a people not to play favors but so as to create a four-dimensional PowerPoint presentation for the rest of humanity to say, look, if you love God, you can also have the goodies. But the Bahuns are not supposed to misuse their enhanced powers. They are not to mistreat others, or to inflict injustice. Casteism God disapproves of.

Khan Academy


https://www.facebook.com/groups/sebsonline/permalink/10162296882420164/ 9/24/2019

सन २०१५ को भुकम्प का लागि सेबस नार्थ अमेरिका ले पैसा उठायो। १०-१५ हजार उठला भनेर सोचेको ४ लाख बढ़ी उठ्यो। सेबस नार्थ अमेरिका अमेरिका मा दर्ता भएको नॉन प्रॉफिट संगठन भएकोले उसले प्रत्येक वर्ष यहाँ को टैक्स विभाग IRS लाई हिसाबकिताब छर्लङ्ग दिनैपर्छ। कानुन छ। You can't avoid death and taxes भन्ने उखान।

कसैले प्रश्न उठाएर बल्ल हतार हतार हिसाबकिताब देखाएको भन्ने हुँदैन। र जुन किसिमको सामुहिक नेतृत्व छ, "पैसा खाने" भन्ने पनि हुँदैन। यहाँ त FBI आउँछ।

भने पछि जुन हिसाबकिताबमा सेबस नार्थ अमेरिका २०१५ मैं दुरुस्त थियो त्यही हिसाबकिताबमा सेबस नेपाल ले गड़बड़ गरेको हुने संभावना थिएन र छैन।

तर प्रश्न उठाउन पाइन्छ। लोकतान्त्रिक संस्कार को कुरा हो। प्रश्न उठायो भनेर चित्त दुखाइ पनि गर्नु हुँदैन। तर प्रश्न उठाए पछि जवाफ सुन्न पनि सक्नुपर्छ। लोकतान्त्रिक संस्कार भन्दा पनि माथि सेबस को आतंरिक संस्कृति को कुरा छ। सबै हिसाबकिताब दुरुस्त रहेको अवस्था मा त्यो हेरेर ल अब चाहिं चित्त बुझ्यो भनेर सीडीओ ऑफिस मा दिएको उजुरी फिर्ता लिन पनि सक्नुपर्छ। होइन भने नियत ख़राब हो कि भनेर शंका गर्ने ठाउँ रहन्छ।

हेडमास्टर सेलेक्शन प्रक्रिया बारे पनि प्रश्न गर्न पाइन्छ। लोकतान्त्रिक संस्कार को कुरा हो। समिति ले नंबर एक कैंडिडेट बादल प्रधान निर्धारित गरेको तर बादल प्रधान एक वर्ष अमेरिका जाने देखेर नम्बर दुई कैंडिडेट लाई हेडमास्टर बनाएको देखिन्छ। बादल प्रधान अहिले एक वर्ष का लागि अमेरिका मा छन पनि। पाँच वर्ष पछि त्यही प्रक्रिया दोहोरिएला। बादल प्रधान ले फेरि अप्लाई गर्ने नगर्ने बादल प्रधान को कुरा हो।

सेबस स्कुल कै कुनै बिभाग ले चलाउने कि भनी विचार प्रस्तुत भएको छ। त्यो पनि लोकतान्त्रिक संस्कार को कुरा हो। छलफल हुनुपर्छ। तर पहिला त सीडीओ ऑफिस को उजुरी फिर्ता लेउ। अमेरिका को IRS ले दुरुस्त मानेको हिसाबकिताब माथि प्रश्न उठाउने ठाउँ देखिँदैन।

त्यो उजुरी फिर्ता लिए पछि यस विषयमा छलफल गर्न मिल्छ। सेबस संस्था डिजॉल्व गरेर स्कुल को कुनै बिभागले चलाउने कुरा सेबस ले मात्र निर्णय गर्न सक्छ। तर निर्णय जे सुकै भए पनि सेबस मा सहभागिता बढाउनुपर्छ। All former students are automatic voting members entitled to being witnesses to transparent bookkeeping and transparent decision making in the organization. And there ought to be online voting during elections because SEBS has a global presence.

Sunday, July 28, 2019

के नेपाल लाई अर्को संविधान सभा को आवश्यकता छ?



के नेपाल लाई अर्को संविधान सभा को आवश्यकता छ?

लोकतान्त्रिक तवरले बनेको संविधान को घोषणा लाई आधा देशले कालो दिवस को रुपमा मनाउँदैन। लोकतान्त्रिक तवरले बनेको संविधान को घोषणा गर्दा एक दुई सय मान्छे शहीद हुनुपर्दैन। लोकतान्त्रिक तवरले बनेको संविधान देश माथि लादन का लागि एउटा स्वतः स्फुर्त आन्दोलन, एउटा शांतिपुर्वक संचालित आन्दोलन माथि फ़ासिस्ट दमन गरिँदैन। त्यो फ़ासिस्ट दमन को रिपोर्ट लाई कुनै पनि लोकतान्त्रिक चरित्र भएको प्रधान मंत्री ले दबाएर राख्न सक्दैन।

स्वाभाविक छ यो संविधान अवैध छ। यो समाजवादी होइन फ़ासिस्ट संविधान नै हो। त्यसैले त नेकपा को एक जना शीर्ष पदाधिकारी ले प्रधान मंत्री निवासकै जग्गा आफ्नो नाम मा गर्न भ्याएको छ। पञ्च हरु पनि चोरी गर्दा लुकी लुकी गर्थे। कसैले थाहा पाऊँछन कि भन्ने डर हुन्थ्यो। नेपालका सत्ताधारी फ़ासिस्ट हरु लाई त त्यो डर पनि नलाग्ने रहेछ।

हुन त संविधान सभाले पनि दुई तिहाई ले नै संविधान पास गर्ने हो, र आखिर संसदले कुनै पनि बेला दुई तिहाई ले संविधान संसोधन गर्न सक्छ। संविधान सभा नै किन चहियो? संसद छँदै छ त।

संविधान सभाले संसदले गर्ने प्रत्येक काम गर्न सक्छ। सरकार बनाउन र ढालन सक्छ। संविधान बाहेक का कानुन बनाउन हटाउन सक्छ। तर संसदले संविधान सभाले गर्ने प्रत्येक काम गर्न सक्दैन। संसदमा व्हिप लाग्छ। संविधान सभामा व्हिप जारी गर्न पाइँदैन। भने पछि प्रत्येक संविधान सभा सदस्य ले निर्धक्क भएर बोल्न पाउँछ र मतदान गर्न पाउँछ। संविधान को प्रत्येक धारा र उपधारा बारे प्रत्येक संविधान सभा सदस्य ले बोल्न पाउने भने हुन्छ। त्यो बहस बिना कुनै मतदान हुँदैन। सिंगो संविधान बारे एउटा मतदान हुँदैन। प्रत्येक धारा र उपधारा बारे छुट्टा छुट्टै मतदान हुन्छ।

देशमा राजतन्त्र फर्केर आउँदैन। त्यो पारसले सुनिश्चित बनाइसकेको कुरा। राजतन्त्र को भुत देखाएर देशमा फ़ासिस्ट संविधान लादने काम भयो। नहीं तो गब्बर आ जाएगा भन्ने काम भयो।

देशले संविधान संसोधन होइन संविधान को अवसान खोजेको हो। देशले नया संविधान सभा नै खोजेको हो।

त्यहाँ सम्म पुग्ने बाटो के हो? देशले नया संविधान सभा नै खोजेको छ भनेर जनताको मा जाने। मैंडेट लिने। सरकार बनाउने र सम्विधान सभाको चुनाव गर्ने।

यो संसोधन गर्न नमिल्ने संविधान हो। प्रयास बेकार छ।


Sunday, July 21, 2019

के सीके राउत का अगाडि इम्मानुएल मेक्रोन को बाटो उपलब्ध छ?



के सीके राउत का अगाडि इम्मानुएल मेक्रोन को बाटो उपलब्ध छ? फ्रांस का इम्मानुएल मेक्रोन ले त्यति बेला का फ्रांस दुई ठुला पार्टी को झंडा नबोकेर नै फ्रांस को राष्ट्रपति पद जितेर देखाइदिए। लगत्तै आफ्नो नया पार्टी मार्फ़त त्यस पछि संसद पनि बजाए। के सीके राउत सँग त्यो बाटो उपलब्ध छ?

इम्मानुएल मेक्रोन त्योभन्दा पहिला मंत्री भएका मानिस थिए। दुई ठुला पार्टी मध्ये एक को मंत्रिमंडल मा थिए। एकाएक आएका भने होइनन। फ्रांस को साक्षरता, राजनीतिक चेतना र आर्थिक समृद्धि अर्कै लेवल मा छ। त्यहाँ को चुनाव पनि अर्कै किसिमको छ। राष्ट्रपति प्रत्यक्ष निर्वाचित हुने देश। इम्मानुएल मेक्रोन ले फ्रांस मा जे गरे त्यो शायद अमेरिका, बेलायत, जर्मनी, भारतमा संभव छैन। नेपालको संसदीय व्यवस्था पनि त्यस्तै छ।

तर गर्ने नसकिने भने होइन। सच्चा संघीयता, भ्रष्टाचार, आर्थिक क्रांति को मुद्दा लाई दरो सँग समाएर सम्मिश्रण गरेर पस्किन सके शायद त्यस्तो ज्वारभाटा ल्याउन सकिन्छ। तर त्यो गार्हो काम हो। फेरि मधेस अलग देश भनेर आफ्नो इमेज बनाएका मानिस लाई सारा देशले पहिलो चुनावमैं पत्याउने संभावना धेरै नहुन सक्छ।

मेनस्ट्रीम (मध्यमार्ग) मा आएपछि त्यो मेनस्ट्रीम मा आएकै कारणले चर्चामा रहेका छन सीके। कुनै नया मुद्दा सल्काउन सकेको देखिँदैन।

यी बिभिन्न कारणले मेरो विश्लेषण छ शायद सीके का अगाडि इम्मानुएल मेक्रोन को बाटो उपलब्ध छैन कि? ठोस बाटो भनेको अहिले पहिलो चरणमा कस्सिएर संगठन निर्माण गर्ने, दोस्रो चरणमा पार्टी एकीकरण गर्ने, संसद, पार्टी र मीडिया मा स्पेस बनाउने र त्यो स्पेस बढाउँदै लाने बाटो शायद बढ़ी उपलब्ध पो छ कि? यो संगठन विस्तार र पार्टी एकीकरण को बाटो बढ़ी ठोस बाटो हो। एकीकरण पछिको दोस्रो महाधिवेशन सम्म मा पार्टी अध्यक्ष पद नै पनि ताकन सकिन्छ। त्यो बढ़ी संभव बाटो हो।

पार्टी एकीकरण का समय, समयतालिका, अंकगणित, और केमिस्ट्री



Friday, July 19, 2019

आरक्षण बहस: राजेश अहिराज र तुला नारायण साह



Pros and Cons
Arguments For and Against Affirmative Action
The Case for Affirmative Action
The Best New Argument for Affirmative Action
7 Criticisms Of Affirmative Action That Have Been Thoroughly Disproved

पार्टी एकीकरण का समय, समयतालिका, अंकगणित, और केमिस्ट्री

Federalism: Unfinished Business In Nepal
सपा, राजपा, जपा र त्रिपा को एकीकरण
समाजवादी पार्टी ले १० प्रदेशको कुरा उठाएर देशमा तेस्रो ध्रुवको निर्माण गर्न सक्छ



पार्टी एकीकरण का समय

नेपालमें सच्चा संघीयता लागु करने से पहले आर्थिक क्रांति संभव ही नहीं है। या तो आप इस बातको मानते हैं या नहीं। मैं कसके मानता हुँ। आर्थिक क्रांति का परिभाषा हुवा लगातार २०-३० साल तक नेपालमें आर्थिक वृद्धिका दर दो अंको का होना। डबल डिजिट ग्रोथ जिसे कहते हैं अंग्रेजी में। तो नेपालमें आर्थिक क्रांति अभी चाहिए कि ५० साल बाद आने से भी काम चलेगा? अभी नहीं ३०-४० साल पहले होना था। बहुत समय जाया गया। तो आर्थिक क्रांति की जल्दबाजी अगर है देशको तो देशको सच्चा संघीयता देना होगा। जिस तरह पंचायती व्यवस्था और राजतन्त्र लोकतंत्र के विरोधी शक्ति थे उसी तरह कांग्रेस और कम्युनिस्ट सच्चा संघीयता विरोधी शक्ति हैं। उनके विरुद्ध सिर्फ मोर्चाबंदी करने से काम नहीं चलेगा। एक तीसरी पार्टी की निर्माण करनी होगी। जनतासे आन्दोलन कर उनसे अंतिम बलिदान मांगने वाले नेता लोगो को समझना होगा कि जनता अंतिम बलिदान देती है तो नेता लोगो को कमसेकम चाहिए कि वो अपना गृह कार्य करे। आजके सन्दर्भमें वो गृह कार्य पार्टी एकीकरण और संगठन निर्माण एवं विस्तार ही है। आप कितना भी आंदोलन कर लिजिए लेकिन संसद में अंक गणित नहीं जुटा पाते हैं तो आपकी जो एजेंडा है वो पिछे पड़ी रहेगी। यानि कि अगला स्थानीय, प्रादेशिक और संसदीय चुनाव को डेडलाइन मानके चलना होगा। चुनाव से कमसेकम एक साल पहले पार्टी एकीकरण का काम ख़त्म हो जाना चाहिए। चुनावमें बुरी तरह हार जाने के दो महिना बाद पार्टी एकीकरण करना न करना बराबर होगा। सिर्फ मधेसी को नहीं जोड़िए संविधान संसोधन से। अंक गणित फिका पड़ जाता है। सिर्फ जनजाति को नहीं जोड़िए। अंक गणित दो तिहाई पहुँच जाती है लेकिन राजनीतिक चेतना उस कदर नहीं है अभी तक। संविधान संसोधन को सच्चा संघीयता से जोड़िए और सच्चा संघीयता को आर्थिक क्रांति से ताकि शत प्रतिशत नेपाली जनता को टारगेट किया जा सके। आर्थिक क्रांति तो सभी को चाहिए। बाहुन क्षेत्री को भी चाहिए। सरकारी जागीर करने वाले बाहुन क्षेत्री सिर्फ कुछ लाख होंगे। बाँकी में अधिकांश तो गरीब ही तो हैं। सरकारी जागीर करने वाले बहुसंख्यक भी गरीब हैं। सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाना बहुत जरुरी है। लेकिन उससे मुख्य रूपसे दमजम को सम्बोधित किया जा सकता है।

पार्टी एकीकरण का समयतालिका

कुछ साल के प्रयास के बाद उपेन्द्र यादव और बाबुराम तो मिल गए। मोर्चा नहीं बनाया। पार्टी एकीकरण की। मोर्चा बनाने की बात बेतुक बात है। मुद्दा कठिन हो तो मोर्चाबंदी से काम नहीं चलेगा। फोरम और नया शक्ति एक हो गए। अब अगला कदम है सपा और राजपा एक हो जायें। नया शक्ति का फोरम में एक हो जाने से अंक गणित में बहुत फर्क नहीं हुवा है। पहले जो ५०-५० था उसमें थोड़ा १९/२० हुवा है। सपा और राजपा एक होने के बाद शायद तीसरा नम्बर आता है सीके राउतका। अकेले वो चुनाव लड़ेंगे तो जाने नजाने केपी ओली द्वारा प्रयोग हो जाएंगे। सपा और राजपा का भोट काटेंगे, खुद मधेसमें ५% या उससे कम पर अटक जाएंगे। सपा और राजपा का भोट काट कर मधेसमें कांग्रेस कम्युनिस्ट के जीतका मार्ग प्रशस्त करेंगे। वो नहीं होने देना है। मुद्दा जब हुबहु मिलता हो तो अलग पार्टी चलाने का मतलब क्या? अन्त में शायद हृदयेश त्रिपाठी आ सकेंगे। १०-१२ महिने में जब प्रचंड प्रधान मंत्री बनेंगे तो हृदयेश त्रिपाठी का उस मंत्री मंडल में आने की संभावना है। मंत्री बनना बड़ी बात नहीं। वो जरुरी चीज नहीं है। लेकिन ओली से अलग चल कर अगर प्रचंड संविधान संसोधन का मुद्दा आगे बढ़ाते हैं जैसा कि सोंचा जा रहा है तो हृदयेश के उस प्रयोग के लिए भी थोड़ा समय दे दिया जाए। उपेन्द्र यादव भी तो उसी आशा में मंत्रीमंडल में बैठे हुवे हैं। पुर्व माओवादी वाले भले संविधान संसोधन की बात करे पुर्व एमाले वाले जो कि बहुमत में हैं वो रोड़ा अड़कायेंगे ऐसा अनुमान किया जाता है। तो प्रयोग असफल होने के बाद हृदयेश त्रिपाठी या तो नया झंडा ढूढ़ेंगे या तो फिर उनकी राजनीति समाप्त हो जाएगी। छोटेमोटे कई जनजाति पार्टियां हैं। उन्हें भी मुद्दा के आधार पर एक एक कर के एकीकरण करते हुवे आगे बढ़ना होगा।

पार्टी एकीकरण का अंकगणित

फोरम और राजपा ५०-५० पर थे। अब नया शक्ति से मिलने के बाद शायद सपा को थोड़ा और बड़ा मानना होगा। अब शायद ५५-४५ पर बात हो। पार्टी एकीकरण की बात शुरू होते तक सीके राउत के जनमत पार्टी की सदस्य संख्या कितनी पहुँचती है। वो देखना होगा। अगर पार्टी सदस्य संख्या एक लाख से उपर ले जाते हैं तो सपा प्लस राजपा को २/३ और जनमत पार्टी को एक तिहाई मान कर एकीकरण किया जा सकेगा। सीके राउत को पार्टी में प्रथम पाँच में एक पद देना होगा। हृदयेश त्रिपाठी को तो कपिलवस्तु या रुपन्देही या परसा महोत्तरी कहीं एक सीट देना होगा। उनके कुछ साथीयों को पश्चिम तराई में टिकट। हृदयेश संसदीय मनस्थिति ले के चलते हैं। हृदयेश को पार्टी भितर पद अंक गणित नहीं केमिस्ट्री और हिस्ट्री के आधार पर दिया जाना जरुरी है। एक सम्मानजनक पद।

चुनाव से एक साल पहले पार्टी एकीकरण का काम ख़त्म कर लेने के बाद एक नजर कांग्रेस पार्टी पर भी डालने की जरुरत पड़ सकती है। लेकिन पहले मुद्दा की बात होगी। संविधान संसोधन के मुद्दे पर कांग्रेस एक ज्वॉइंट मेनिफेस्टो पर अगर तैयार हो जाती है तो उसको मधेसमें २५% और पहाड़में ५०% सीट देकर एक मोर्चा बनाया जा सकता है। लगभग दो तिहाई पर रही नेकपा को फेकना है तो उतना करना पड़ सकता है।

पार्टी एकीकरण की केमिस्ट्री 

केमिस्ट्री में प्रथम बात तो मुद्दा ही है। मुद्दा स्पष्ट है। लेकिन विभिन्न नेताओं के पर्सनालिटी की भी बात आ जाती है। पार्टीका अध्यक्ष कौन बने? ये केमिस्ट्री की बात नहीं है। ये अंक गणित की बात है। लेकिन इसको केमिस्ट्री की बात बना कर अभी तक पार्टी एकीकरण को न होने देने का काम किया गया है। उपेन्द्र यादव को लगता है मुझे पार्टी अध्यक्ष मानिए दो मिनट में पार्टी एकीकरण हो जाएगा। राजेन्द्र महतो को लगता है उपेन्द्रजी अध्यक्ष मंडल में एक सीट आप भी ले लिजिए। ऐसे में मुद्दा गौण हो जाता है। जो ओली संविधान संसोधन का विरोध कर के ही चुनाव जिता है उसी ओली को अनुनय विनय करने पहुँच जाते हैं कि संविधान संसोधन करो।

आपको पार्टी अध्यक्ष बनना है तो व्यापक संगठन विस्तार करिए ताकि ज्यादा से ज्यादा महाधिवेशन प्रतिनिधि आपको मत दें। और उस अंक गणित के आधार पर बनिए पार्टी अध्यक्ष। लेकिन पार्टी अध्यक्षता सिर्फ अंक गणित की बात नहीं है। पार्टी के अंदर एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति होनी चाहिए की नेतृत्व परामर्श खोजने वाली हो अर्थात कंसल्टेटिव (consultative) . निर्णय करिए व्यापक छलफल के बाद। पार्टी  पदाधिकारी, पोलिटब्युरो सदस्य, केन्द्रीय समिति को लगे कि सभी बड़े छोटे निर्णय में ज्यादा से ज्यादा सहभागिता रहती है।

अंक गणित के आधार पर भले ही पार्टी अध्यक्ष उपेन्द्र यादव हो जाएँ लेकिन पार्टी नेतृत्व का स्टाइल राजपा के अध्यक्ष मंडल टाइप का ही होना होगा। व्यापक विचार विमर्श के आधार पर निर्णय की संस्कृति अपनानी होगी। इसके लिए पार्टी के शत प्रतिशत केन्द्रीय सदस्य और पदाधिकारी निर्वाचित होने की व्यवस्था की जा सकती है। पार्टी के भितर भी तो आरक्षण चलेगी। जहाँ दलित पदाधिकारी चाहिए वहाँ सिर्फ दलित उम्मेदवारी की नियम बनाई जा सकती है।

एकीकृत पार्टीका अंतिम नाम जनता पार्टी या नेपाल जनता पार्टी कर सकते हैं।

मुद्दा के प्रति वफ़ादारी

सामाजिक न्याय की बात करने वाले पार्टी और नेतागण वास्तव में मुद्दा के प्रति वफादार हैं तो पार्टी एकीकरण के महत्व को समझेंगे और अगली चुनाव के लिए उसे अपरिहार्य मानेंगे। जनता से मैंडेट लाइए और खुद संविधान संसोधन करिए।

एकीकृत पार्टी ले काठमाण्डु उपत्यका को १० को १० सीट ताकन सक्छ। राजेन्द्र श्रेष्ठ कीर्तिपुर बाट सांसद बन्छन।

Thursday, July 18, 2019

Federalism: Unfinished Business In Nepal



The republic has been established, a basic democracy has been established, but the federalism in Nepal is in name only. Federalism in Nepal today feels like democracy in 1988. It is unfinished business. A cosmetic federalism has been enshrined in the constitution, but even that limited federalism is thwarted by the state in practice every step of the way.

The Nepali Congress that held sway over the country from 1990 to 2005 and the Nepal Communist Party that has become the new status quo both are inherently anti-federalist forces. Their commitment to federalism can be compared to the commitment of the royalist party RPP to democracy. It is in name only. They never wanted it, and so worked in tandem to dilute it as much as possible. The fascist suppression of the Madhesi uprising after the unfair constitution was promulgated is a wound in history that is still gaping. The NC and the NCP are the very reason Nepal has been denied genuine federalism. Only when they are downsized into oblivion will Nepal see federalism the way it was meant to be.

The party that is in the best position to lead Nepal to that promised federalism right now is the Samajwadi Party that was formed when Upendra Yadav and Baburam Bhattarai joined forces. It also has illustrious leaders like Ashok Rai and Rajendra Shrestha. Other parties with similar commitments to social justice have to do the math and realize it is in unification with the Samajwadi Party that victory lies. The immediate candidates for unification are the Mahanth Thakur led Rashtriya Janata Party, the CK Raut led Janmat Party and the independent political group led by Hridayesh Tripathy. They all are mass-based. There are also smaller parties, many of them Janajati, that are ripe candidates for unification. If this unification can be brought about over the next two years, the party that emerges will be in a good position to sweep the 22 districts in the Terai. The magic of doing that is that then you force the NC and the NCP to compete with each other in the Pahad. The Samajwadi Party's 10 state proposal, explained well, will see it do well also in the Pahad among the Janajati groups.

It would be unrealistic to think the NC and the NCP might get wiped out. But if they are only sufficiently downsized that will force them to change tack. They might then support the constitutional amendments that will give Nepal genuine federalism.

Before the leaders ask the people for sacrifice, they should be willing to do their own internal homework. For the federalists in Nepal, that homework is the work of party unification.


Friday, July 05, 2019

सपा, राजपा, जपा र त्रिपा को एकीकरण

उपेंद्र यादव र बाबुराम वाला समाजवादी पार्टी, राजेंद्र महतो र महंथ ठाकुर वाला राष्ट्रिय जनता पार्टी, सीके राउत को जनमत पार्टी, र हृदयेश त्रिपाठी। यी चार एउटै झण्डा मुनि आउनु बड़ा जरुरी छ। उपेंद्र र बाबुराम त आइपुगे। वर्षौं प्रयास गरे। बल्ल आइपुगे। समय लाग्दो रहेछ त।

अर्को कदम हो समाजवादी पार्टी र राष्ट्रिय जनता पार्टी को एकीकरण। यो ५०-५० फोर्मुला मा गर्दा भइहाल्छ। नाम के राख्ने? त्यो सानो समस्या हो। पार्टी को पोलिटब्युरो भने बलियो हुने भो।

अहिले सीके राउत संगठन विस्तार गर्नमा सक्रिय छन। एक डेढ़ वर्ष त्यसकालागि समय दिन पर्छ। तर त्यसपछि सपा र राजपा एक गरेर बनेको पार्टीले सीके सँग पनि वार्ता थाल्नुपर्छ।

हृदयेश त्रिपाठी सँग एकीकरण गर्न सजिलो छ। हृदयेश को चुनाव क्षेत्र यस्तो विचित्र को बनाइएको छ कि अब त्यहाँ ढाका टोपी लगाएर नै भोट माग्नुपर्ने अवस्था आइसक्यो। अँग्रेजी मा gerrymandering भन्छन। नेपालीमा शायद जेरी पकाएको भनिन्छ होला। हृदयेश कपिलवस्तु, पर्सा, महोत्तरी जहाँ बाट चुनाव लड़े पनि भो। महंथ ठाकुर सर्लाही बाट महोत्तरी पुगिसके। राजेंद्र महतो सर्लाही बाट जनकपुर पुगे। हृदयेश ले नवलपरासी छोड़ने अब। हृदयेश त्रिपाठी सँग एकीकरण गर्न उनलाई एउटा चुनाव क्षेत्र दिनुपर्ने हुन्छ। बस।

यी चार को एकीकरण सँग थुप्रै साना सना पार्टी छन तिनी सँग पनि एकीकरण गर्नुपर्ने हुन्छ।

देशले तेस्रो ध्रुव खोजेको अवस्था छ। पाटन मा मशाल जुलुस निस्किनु भनेको तख्तापलट।

महाकाली भारत लाई बेचेर केपी ओली ले आफ्नो लागि महल खड़ा गरे। भारत लाई गाली गरेर दुई तिहाई। दुई तिहाई गन्हाइ सक्यो। काठमाण्डु उपत्यका का जनता कम्युनिस्ट लाई मन पराउन छोड़ेको काँग्रेस लाई मन पराउन नसकेको अवस्थामा छन। These are gathering storms. आकाशमें बादल मंडरा रहे हैं।

तर नेता हरुले आतंरिक गृहकार्य त गर्नुपर्छ। एकीकरण नै त्यो गृहकार्य हो।





Saturday, June 29, 2019

समाजवादी पार्टी ले १० प्रदेशको कुरा उठाएर देशमा तेस्रो ध्रुवको निर्माण गर्न सक्छ

संविधान संसोधन मात्र भन्दा कुरा अस्पष्ट हुने गरेको छ। देशको विकास भने जस्तो। अस्पष्ट। तर १० प्रदेश भन्दा त्यो स्पष्ट हुन जान्छ। संविधान संसोधन मात्र भन्दा मधेसी मात्र को भन्ने अर्थ लाग्ने गरेको छ। १० प्रदेश भन्दा जनजाति पनि समाउने हुन्छ। गुठी विधेयक ले गर्दा पाटन मा मशाल जुलुस फेरि निस्कियो। त्यो त व्यवस्था नै ढालने किसिमको रोष हो। कम्युनिस्ट लाई पत्याउन छोड़ेको, काँग्रेसलाई फेरि मन पराउन नसकेको अवस्थामा देखिए काठमाण्डु उपत्यकाका जनता। देशमा तेस्रो ध्रुव को निर्माणको संभावना प्रबल भएर आएको छ।

त्यो तेस्रो ध्रुव अहिलेको अवस्थामा उपेन्द्र यादव र बाबुराम को समाजवादी पार्टी हुने प्रबल संभावना छ। 






Sunday, May 19, 2019

Vote For Suneel Sah For NRNA USA President

Wednesday, May 08, 2019

बाबुराम र उपेन्द्र नजिक आऊँदा समाजवादी पार्टी ले वैचारिक स्पष्टता पाउँछ कि

अशोक राई एक समय त्यति बेलाको एमाले को नम्बर दुई नेता। बाबुराम भट्टराई त्यसै गरी माओवादीमा दुई नम्बर भएर बसेको। उपेन्द्र यादव मधेस आन्दोलनको गजेन्द्र नारायण सिंह पछिको नया संस्करण। तीनै जना कट्टर वामपन्थी। नया बनेको समाजवादी पार्टी उकालो जाला त?

फोरम ले मधेसी मात्र होइन जनजाति पनि ताकेको हो। तर वैचारिक स्पष्टता को सदा अभाव देखियो। वैचारिक स्पष्टता पनि देखिएन रणनीतिक सुझबुझ पनि देखिएन। ती दुबै कुरा बाबुराम भट्टराई का बलिया पक्ष हुन।

पहाड़मा तर संगठन विस्तार कसले पो गर्ने। त्यो चाहिं अझै स्पष्ट छैन।




Tuesday, April 30, 2019

नेपाल जनमत पार्टी (नेजपा)

सीके राउतको जनमत पार्टी जनाधार भएको पार्टी हो। विकल्पको राजनीति गर्ने इच्छा भएका थुप्रै फॉरेन रिटर्न हरु ले त्यही क्लेम गर्न सक्ने अवस्था छैन। जनमत पार्टी एक्लै चुनाव लड़े राष्ट्रिय पार्टी बन्ने मात्र होइन देशको दोस्रो अथवा तेस्रो ठुलो पार्टी बन्ने देखिन्छ।

उज्वल थापाको विवेकशील दल छ। रविन्द्र मिश्र को साझा पार्टी छ। दर्शन रौनियार को देश बचाउ अभियान छ, M4C, Movement For Change। रूद्र पाण्डेको फेसबुक पार्टी छ हाम्रो पार्टी नाम गरेको। यी सबै देश विदेश पढ़े घुमेका मानिस हुन। तर व्यापक जनाधार भएको सीके राउत मात्र छ। भने पछि भ्रष्टाचार र आर्थिक क्रांति को मुद्दा मा एक हुन सक्नुपर्यो।

तर मधेसीलाई समानता दिलाउने कुरामा एक ठाउँ आउन सक्नुपर्छ पहिलो कदम। त्यति त गर्न सक्नुपर्यो नि।

लोकतन्त्रमा विश्वास गर्ने तर वार्तालाप पनि गर्न नसक्ने? वार्ता गर्ने कला नभएको?

मधेसीले एक व्यक्ति एक मत लोकतंत्र भन्दा बढ़ी केही पनि मागेको छैन। त्यहाँ कुरा मिले पछि भ्रष्टाचार र आर्थिक क्रांति को मुद्दा मा कुरा मिलाउन सक्नुपर्छ।

एउटै एकीकृत पार्टी चहियो। तर पार्टी को नाम हाम्रो विवेकशील साझा जनमत अभियान राख्न भएन। फ्रैंकेंस्टाइन नाम।

उपयुक्त नाम हुन्छ नेपाल जनमत पार्टी (नेजपा)  र पार्टी अध्यक्ष स्वतः सीके राउत नै हो।  पार्टी अध्यक्ष र भोलि गएर संसदीय दलको नेता। सीके ले मही माग्ने ढुङ्ग्रो लुकाउने गर्नु हुँदैन। स्पष्ट नेता अगाडि सार्न नसक्ने पार्टीले चुनाव जित्न सक्दैन। खाना नै नपस्किने रेस्टोरेंट मा कसले गएर आर्डर दिन्छ?

उज्वल थापा, रविन्द्र मिश्र, दर्शन रौनियार, रूद्र पाण्डे आदि ले आ आफ्नो "NGO" हरुलाई राजनीतिक दल बनाउने एक मात्र उपाय यही हो। र समय सीमा छ। यसरी एकीकरण नगरेर चुनावमा गएर हारे ती सबै दल समाप्त हुनेछन।

भने पछि वार्ता गर्नु पर्यो। कुरा अगाडि बढाउनु पर्यो।

यसरी एकीकरण गरे रविन्द्र मिश्र ले वानेश्वर बाट अर्को चुनाव जित्ने हो। स्वर्णिम वाग्ले हरु के खान अस्ताएको घाम काँग्रेस पार्टी मा लागिबसेको? रविन्द्र मिश्र लाई समाउने।

 एक पटक को नेपाली सधैँ को नेपाली। प्रवासका ५० लाख नेपाली ले फोन बाट वोट खसाल्न पाउनुपर्यो।