दहेज का अभिशाप
दहेज नहीं, यह सौदा है,
जहाँ बेटी नहीं—सिक्का है।
ममता की कीमत आँकी जाती,
रिश्तों की बोली लगती है।
काग़ज़ पर लिखा वरदान नहीं,
यह सदियों का एक पाप है।
मुस्कानों के पीछे छुपा,
यह समाज का बदनुमा दाग़ है।
कभी आग बनकर जलाता है,
कभी ज़िंदा लाश बनाता है।
कन्यादान के नाम पर यह,
मानवता को शर्मसार कर जाता है।
माँ की लोरियाँ चुप हो जातीं,
बाप की आँखें झुक जाती हैं।
एक रकम की भूख में आकर,
ज़िंदगियाँ कुर्बान हो जाती हैं।
अब समय है—आवाज़ उठे,
हर घर से यह प्रण लिया जाए।
न रिश्ता बिके, न बेटी जले,
दहेज को जड़ से मिटाया जाए।
दहेज नहीं—सम्मान चाहिए,
बराबरी का अधिकार चाहिए।
आज नहीं तो कब फिर कहेंगे—
यह कुप्रथा अब समाप्त चाहिए।
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